शरद पूर्णिमा: सोलह कलाओं से परिपूर्ण होगा चंद्रमा

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    देहरादून। हिंदू पंचाग के अनुसार आश्विन मास की शरद पूर्णिमा की तिथि पर महर्षि वाल्मीकि का जन्मदिन ‘वाल्मीकि जयंती’ के नाम से मनाया जाता है। इस बार वाल्मीकि जयंती का दिन पांच अक्टूबर निर्धारित है। वैदिक काल के प्रसिद्ध महर्षि वाल्मीकि ‘रामायण’ के रचयिता के रूप में विश्वविख्यात हैं। महर्षि वाल्मीकि संस्कृत भाषा में निपुण और महान कवि थे। महर्षि वाल्मीकि का जन्म महर्षि कश्यप और माता अदिति के नौवें पुत्र वरुण और उनकी पत्नी चर्षि्ण के घर में हुआ। महर्षि वाल्मीकि का नाम उनके कड़े तप के कारण पड़ा था। एक समय ध्यान में मग्न वाल्मीकि के शरीर के चारों ओर दीमकों ने अपना घर बना लिया। जब महर्षि वाल्मीकि की साधना पूरी हुई तो वो दीमकों के घर से बाहर निकले। दीमकों के घर को वाल्मीकि कहा जाता है इसलये महर्षि जी ‘वाल्मीकि’ नाम से प्रसिद्ध हुए।
    शरद पूर्णिमा जिसे कोजागरी पूर्णिमा या रास पूर्णिमा भी कहते हैं हिंदू पंचांग के अनुसार अश्विन मास की पूर्णिमा को कहते हैं। ज्योतिषियों के अनुसार पूरे साल में केवल इसी दिन चंद्रमा सोलह कलाओं से परिपूर्ण होता है। हिंदू धर्म मे इस दिन कोजागर व्रत मनाया जाता है। इसी को कौमुद्री व्रत भी कहते हैं। इसी दिन भगवान श्रीकृष्ण ने महारास रचाया था। मान्यता ये है इसी रात्रि को चंद्रमा की किरणों से अमृत गिरता है। तभी इसी दिन उत्तर भारत मे खीर बनाकर रातभर चांदनी में रखने का विधान है। आचार्य कमल किशोर लोहनी ने बताया कि पंचांग के अनुसार यह संयोग आज रात 8 बजकर 50 मिनट से शुरू होकर दूसरे दिन की रात 12 बजे तक रहेगा। वहीं शुभ योग सुबह 5 बजकर 55 मिनट से लेकर रात 12 बजकर 10 मिनट तक रहेगा।

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