हिमालयी क्षेत्र में तिब्बत से उत्तराखंड तक महाभूकंप का खतरा, जानिए वजह

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देहरादून। तिब्बत से लेकर समूचे उत्तराखंड में महाभूकंप (मेगा अर्थक्वेक) का खतरा भूगर्भ में पल रहा है। इस पूरे हिमालयी क्षेत्र में तेजी से भूकंपीय ऊर्जा को एकत्रित हो रही है, मगर बाहर नहीं निकल पा रही है। इस बात का पता वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. आरजे पेरुमल के अध्ययन में चला। इसी अध्ययन के आधार पर हाल ही में डॉ. पेरुमल नेशनल जियोसाइंस अवार्ड प्राप्त कर चुके हैं।

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वाडिया के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. आरजे पेरुमल ने बताया कि

वाडिया के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. आरजे पेरुमल ने बताया कि कुमाऊं-मढ़वाल और नेपाल हिमालय (तिब्बत से उत्तराखंड वाला भूभाग) में नेशनल जियोफिजिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट (एनजीआरआइ) समेत अन्य संस्थानों ने जीपीएस स्टेशन स्थापित किए हैं।

इनके अध्ययन से पता चला कि

इनके अध्ययन से पता चला कि यहां का हिमालयी भूभाग प्रतिवर्ष 18 मिलीमीटर की दर से दक्षिण की तरफ खिसक रहा है, जबकि शेष हिमालयी क्षेत्र में यह दर 12 से 16 मिलीमीटर के बीच है। अधिक सक्रियता के चलते निरंतर भूकंपीय ऊर्जा उत्पन्न हो रही है।इसके साथ ही इस क्षेत्र में ऐतिहासिक विशाल भूकंपों का पता करने के लिए करीब एक दर्जन स्थानों (ऐतिहासिक फॉल्ट लाइन) पर पर खुदाई कर चारकोल की कार्बन डेटिंग की गई। पता चला कि उत्तराखंड में हरिद्वार में लालढांग के पास वर्ष 1344 व फिर 1505 में आठ रिक्टर स्केल से अधिक तीव्रता के भूकंप आए हैं।

इसके बाद से अब तक पूरे भूभाग में भूकंपीय ऊर्जा जमा होने के बाद भी बड़े भूकंप नहीं आए हैं। इन भूकंप में अगर वर्ष 1905 के 7.8 रिक्टर स्केल के कांगड़ा व वर्ष 1934 के बिहार-नेपाल सीमा के आठ रिक्टर स्केल के भूकंप को भी शामिल कर दिया जाए, तब भी इसके बाद कोई बड़ा भूकंप नहीं आया है।

इन तमाम अध्ययन व आकलन से यह भी पता चला है कि जो भूकंपीय ऊर्जा जमा हो रही है, वह धरती में करीब नौ मीटर तक की टूटन पैदा हो सकती है। यदि यह पूर्व के भूकंपों के अनुरूप करीब 600 साल में दोबारा आया तो धरातल की स्थिति को नौ मीटर या इसके अधिक ऊपर-नीचे कर देगा। यदि इसकी पुनरावृत्ति 300 से 400 साल के आसपास हुई तो इसकी क्षमता धरातल पर 4.5 मीटर का अंतर पैदा करने तक होगी। भूकंप कब आएगा, यह कहा नहीं जा सकता, लेकिन इतना जरूर है कि इस पूरे भूभाग पर बेहद शक्तिशाली भूकंप का खतरा मंडरा रहा है।

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